Saturday, June 12, 2021
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इस बुजुर्ग के लिए अभिशाप है गरीबी, दिखाई नहीं देता फिर भी अखबार बेचकर पालते हैं परिवार का पेट

हकीकत में गरीबी बहुत बड़ा अभिशाप है। लोगों को एक वक्त की रोटी तक नसीब नहीं होती, जबकि साधन संपन्न लोग बचे हुए खाने को कचरे में फेंक देते हैं। Muhammad Essa एक ऐसे शख्स हैं जोकि अपने परिवार को पालने के लिए दृष्टिबाधित होने के बावजूद अखबार बेचकर गुजारा कर रहे हैं।

कहते हैं कि दुनिया में गरीबी सबसे बड़ा अभिशाप है। कई लोग तो इतने संपन्न होते हैं कि उनके घर में बना हुआ खाना कचरे में फेंक दिया जाता है, मगर बहुत से लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें दिन में एक वक्त का खाना भी नसीब नहीं होता। लोग रोजगार पाने और परिवार चलाने के लिए क्या क्या नहीं करते। उन्हें हर वो काम करना पड़ता है, जिसके बारे में बहुत से लोग सोचते भी नहीं होंगे। आपने कई बार देखा होगा कि लोग फुटपाथ पर भीख मांगते हैं और बहुत से बच्चों को कचरे के ढेर से खाना उठाते हुए भी देखा होगा।

स्वाभिमानी भी हैं इस दुनिया में

इसके बावजूद बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं, जोकि अपने स्वाभिमान से किसी तरह का समझौता नहीं करते। वह भीख ना मांगकर सडक़ों पर सामान बेचकर रोजी रोटी कमाते हैं। आज हम आपको एक ऐसे ही शख्स की स्टोरी बताएंगे, जिनकी उम्र और स्वास्थ्य दोनों ही इसकी इजाजत नहीं देते, इसके बावजूद वह अपने परिवार को पालने के लिए कितना कष्ट झेल रहे हैं, यह अपने आप में बेहद ही हैरान कर देना वाला है।

मीलों पैदल चलकर बेचते हैं अखबार

जी-हां हम बात कर रहे हैं एक ऐसे शख्स की, जिसे आंखों से दिखाई नहीं देता, इसके बावजूद वह मीलों पैदल चलकर इस बुढापे में अखबार बेचकर अपने परिवार को चलाते हैं। इनके हौंसले, हिम्मत और जज्बे को लाखों लोग सलाम कर रहे हैं। यह शख्स पाकिस्तान (Pakistan) के मोहम्मद एस्सा (Muhammad Essa) है, जिनकी उम्र करीब 70 साल है। वह पिछले काफी समय से अखबार बेचकर (Sale the News Paper) अपने परिवार को पाल रहे हैं। हैरत की बात है कि उन्हें दिखाई नहीं देता, मगर मजबूरी है कि वह इस रोजगार को छोड़ नहीं सकते। वो पाकिस्तान के मुस्तांग शहर (Mustang City Pakistan) के रहने वाले हैं।

अब यह काम भी हो गया है मंदा

मोहम्मद बताते हैं कि अखबार के काम में भी उन्हें अब मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। सोशल मीडिया के जमाने में लोग अपने फोन पर ही अखबार पढ़ लेते हैं। ऐसे में अखबार की बिक्री में बहुत प्रभाव पड़ा है। पहले वह अखबार बेचकर करीब 1500 से 2000 रुपए तक कमा लेते थे। मगर अब उनका धंधा इतनी बुरी तरह से प्रभावित हुआ है कि वह अब मात्र 200 रुपए तक ही कमा पाते हैं। जिससे उनके घर का खर्च बहुत मुश्किल से ही चल पाता है।

साल 1985 से बेच रहे हैं अखबार

मोहम्मद बताते हैं कि वह 1985 से ही अखबार बांटने का काम कर रहे हैं। हालांकि कोरोना काल में उन्होंने न्यूज पेपर के काम को बढ़ते और कम होते हुए देखा है। कोरोना काल में उनके पास कोई काम नहीं था। अखबार का काम भी लगभग बंद हो गया। तब उन्हें काफी दिक्कतें झेलने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इसके बावजूद भी वह अपना हौंसला छोडऩे के लिए तैयार नहीं है। इस्सा कहते हैं कि वह अपने आखिरी दम तक काम करके पैसा कमाएंगे। इस्सा की कहानी बेहद ही दुखदायी है। उम्मीद है कि पाकिस्तान में जो भी उनकी इस कहानी को पढ़ेंगे, वह उसकी मदद के लिए अपने हाथ जरूर आगे बढ़ाएंगे।

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