Friday, June 11, 2021
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किसानों की परेशानी देखकर खुद ही बना दी चाय की प्रोसेसिंग मशीन, छोटे किसानों को मिल रहा बड़ा मुनाफा

देश में चाय की खेती केवल गिने चुने जगहों पर होती है। असम में चाय के बगान देखकर ऐसा लगता है कि इनको उगाने वाले काफी बड़ा मुनाफा कमाते होंगे। जबकि सच्चाई कुछ ओर ही है।

जिन किसानों के चाय के बगान होते है वह तो असल में खाली हाथ ही रह जाते है। बड़े कारखानों में चाय की प्रोसेसिंग ( Processing ) करने वाले मुनाफा कमाते है। किसानों में पास चाय की प्रोसेसिंग को लेकर मशीन ( Machine ) नहीं होती है। इसलिए उन्हें मजबूरन चाय कारखानों में बेचनी पड़ती है। जिससे किसानों को उनकी मेहनत का दाम नहीं मिल पाता है। असम ( Assam ) के ही एक किसान ने इस समस्या का समाधान कर दिया। उन्हें सरकार की ओर से नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन ( National innovation foundation ) ने 2019 में ग्रासरूट्स इनोवेशन अवार्ड ( Grassroots innovation award ) से नवाजा।

durlabh gagoi
दुलर्भ गगोई फोटो- the better india

एक बोरी चाय की पत्तियों के मिलते आठ रुपए

असम के किसान दुलर्भ गगोई ( Durlabh Gagoi)  ने खुद से ही प्रोसेसिंग मशीन ( Processing  Machine ) को तैयार कर दिया। डिब्रूगढ़ जिले में टिंगखोंग के रहने वाले दुर्लभ गोगोई नौवी कक्षा तक पढ़े है। वह अपनी तीन एकड़ जमीन पर चाय की खेती करते है। उन्होंने बताया कि चाय बागान से जो भी खेती की उपज आती है। उसको मैं पास के चाय कारखानों को बेचता हूं। वहां पर एक बोरी ताजा चाय की पत्तियों के लिए मुश्किल से आठ रुपए मिलते है।

खुद तैयार कर दी मशीन

गगोई ने प्रोसेसिंग मशीन के बारे में पता किया तो वह बड़ी कंपनियों को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। जिसमें बड़ी मात्रा में चाय की प्रोसेसिंग होती है। यह छोटे किसानों के लिए किसी काम की नहीं थी। वहीं जो बाजार में छोटी मशीने थी। वह उनकी जरूरतों को पूरा नहीं करती थी। इसलिए उन्होंने भटकने के बजाए अपनी मशीन तैयार करने की ठानी।

सबसे पहले की टी ड्रायर बनाने की शुरुआत

दुर्लभ बताते है कि सबसे पहले ट्री डायर बनाने की शुरुआत की। पहली बार तो मैं इसको बनाने में असफल हो गया। कई असफलताओं के बाद साल 2009 में एक रेसिप्रोकेटिंग ट्री ड्रायर बनाने में सफल हो गए। इस मशीन को बनाने के लिए उन्होंने स्लाइडर क्रैक मेकेनिज्म का इस्तेमाल किया। इसकी मदद से मशीन के अंदर ड्राइंग ट्रे को आगे पीछे किया जा सकता है। इसे पुल पशु ड्रायर के नाम से भी जाना जाता है।

मशीन को बनाने में कई चुनौतियां आई सामने

दुलर्भ के अनुसार मशीन बनाना इतना आसान नहीं था। मशीन को बनाने मेंं कई चुनौतियां सामने आई। वह कई बार फेल हो गए। लेकिन जब वह अपने काम में सफल हो गए तो उनका हौसला बढ़ गया। इसके बाद उन्होंने चाय की प्रोसेसिंग में इस्तेमाल होने वाली दूसरी मशीन भी बनाई। इन मशीनों में मिनी टी स्टीमर, रोलिंग टेबल और राउंड ड्राय  सेमी आटोमैटिक ड्रायर मशीन भी बनाई। उन्होंने मशीन बनाने की शुरुआत अपने लिए की थी। लेकिन जैसे जैसे लोगों को पता लगा वह दूसरों के लिए मशीन तैयार करने लगे।

छोटे किसानों को मिला सबसे अधिक फायदा

दुलर्भ कहते है कि इन मशीनों से छोटे किसानों को सबसे अधिक फायदा मिला। पिछले 10 सालों से वह मशीन बनाने में जुटे हुए है। 74 साल के उद्यमी शोमेश्वर फुकन बताते है कि करीबन 10 साल पहले चाय प्रोसेसिंग के लिए तीन मशीन खरीदी थी। जो अभी तक काफी बढिय़ा काम कर रही है। वह बततो है कि वह अपनी मशीन दूसरों से नहीं बल्कि खुद प्रोसेस करते है। उनकी चायपत्ति देश से बाहर भी जाती है।

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